शास्त्रीय नृत्य कला में पुरुष नर्तकों का मनोवैज्ञानिक द्वन्द

SL-RCTRM-2018 | Special Issue | OCT-2018 | Published Online: 20 October 2018    PDF ( 324 KB )
Author(s)
कविता सुखीजा 1

1रिसर्च स्काॅलर पंजाब यूनिवर्सिटी, चण्डीगढ़

Abstract

आज़ादी के 70 साल पूरे हो चुके हैं, भारतीय शास्त्रीय नृत्य में आज भी महिलाओं को ही प्रधानता दी जाती है। इस स्वतंत्र देष में पुरुष शास्त्रीय नर्तकों को आज भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इसका श्रेय जाता है-समाज के उन घिसे-पिटे विचारों को जो नृत्य को पुरुषत्व के विरूद्ध मानते हैं। उनके अनुसार पुरुषों को ऐसे व्यवसाय का चुनाव करना चाहिए जो उनके पुरुषत्व के अनुकूल हो। नवयुवक जो नर्तक बनना चाहता है, एक ऐसे समाज में बड़ा हो रहा है जहाँ नृत्य को केवल स्त्रियों के लिए उपयोगी माना जाता है। रूढ़िवादी समाज ने पुरुष और महिलाओं की भूमिकाओं को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित कर रखा है अतः वह पुरुषों की नृत्य के प्रति रचनात्मक दृष्टि को अस्वीकारता है। समाज पुरुष नर्तकों के लिए उस तरह से जगह बनाने को तैयार नहीं है जिस तरह से वह खुले हाथों से महिला नर्तकियों को स्वीकार कर रहा है। लैंगिक भेदभाव ही वास्तविक समस्या है और पुरुष कलाकार वास्तव में इससे पीड़ित हैं। माता-पिता यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उनका लड़का डाॅक्टर या इंजीनियर नहीं, बल्कि एक नर्तक होगा। अंतर्निहित डर ज़ाहिर है कि नृत्य उसे स्त्री बना देगा। दुर्भाग्यवश ज्यादातर दर्शक नृत्य कार्यक्रमों में एक महिला की रमणीय शारीरिक चेष्टाओं द्वारा दिल बहलाने आते हैं। वे अप्रशिक्षित दर्शक हैं, जो एक पुरुष के लास्य नृत्य प्रदर्शक के तर्क को नहीं समझ सकते। इसी कारणवश पुरुष नर्तकों में इस कला को अपना व्यवसाय बनाने में हिचकिचाहट दिखती है।इस शोध पत्र के द्वारा मैं कुछ ऐसे पहलुओं को उजागर करने का प्रयास कर रही हूँ जिससे समाज में शास्त्रीय नृत्य करने वाले पुरुष कलाकारों का संघर्ष सबको भली-भाँति समझ आ सके। समय अब समाज के दृष्टिकोण में इन कलाकारों की ओर बदलाव की माँग कर रहा है। इस समाज को भी अपने रूढ़िवादी पुराने विचारों को त्यागकर इस कला में रुचि रखने वाले पुरुषों को उत्साहित कर आगे बढ़ने का रास्ता देना चाहिए। इन कलाकारों की रचनात्मकता और भावनाओं को सम्मान मिलना चाहिए। मैंने इस शोध पत्र का क्षेत्र उत्तर भारतीय शास्त्रीय-नृत्य कथक तक ही सीमित रखा है क्योंकि दक्षिण भारत में स्थिंित थोड़ी अलग है। वहाँ शास्त्रीय नृत्यों को ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है परंतु उत्तर भारत मंें समस्या तीव्र है और जिस क्षण एक लड़का शास्त्रीय नृत्य के प्रति आत्मीयता दिखाता है वह समाज के आलोचनात्मक व्यवहार से परेशान होने लगता है। यूँ भी कहा जा सकता है कि अध्ययन को सुगम व चित्ताकर्षक बनाए रखने के लिए विषय को सीमित रखना आवश्यक था।

 

Keywords
रूढ़िवादी समाज कलाकार मनोवैज्ञानिक
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