शुद्ध शास्त्रीय ठुमरियों का चित्रपट में प्रयोग

SL-RCTRM-2018 | Special Issue | OCT-2018 | Published Online: 20 October 2018    PDF ( 137 KB )
Author(s)
रीमा शर्मा 1

1रिसर्च स्कॉलर, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़

Abstract

उपशास्त्रीय संगीत की लोकप्रिय गायन विधाओं में ठुमरी को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है क्योंकि स्वर एवं ताल युक्त गीत के बोलों की सुमधुर, शृंगारात्मक एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति में यह गायकी पूर्णतः सक्षम है। जिस प्रकार एक नर्तक विभिन्न मुद्राओं और भावभंगिमाओं द्वारा कथा को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करता है। उसी प्रकार ठुमरी गायक मुर्की, कण, खटका, पुकार इत्यादि विशिष्ट गमक प्रकारों द्वारा गीत के बोलों को अलंकृत करते हुए गीत में निहित भावों की अभिव्यंजना करता है। ठुमरी के बोल ही इसकी आत्मा है इसलिए इसमें स्वरों के कलात्मक एवं चमत्कारिक प्रदर्शन को कम महत्व देकर बोलों के भावात्मक प्रदर्शन को प्रबल रखा जाता है। इसकी सरल धुन एवं काव्य की स्पष्ट अभिव्यक्ति को साधारण संगीत प्रेमी भी ग्रहण कर लेता है, इसलिए इसको शास्त्रीय संगीत रसिकों के साथ-साथ जनसाधारण से भी स्नेह प्राप्त हुआ है। ठुमरी के इन्हीं विशेष गुणों से प्रभावित होकर चित्रपट संगीत में भी इसको समय-समय पर शामिल किया गया है। ठुमरी के चलचित्र संगीत में प्रवेश करते ही जनसाधारण भी इसकी ओर आकर्षित होने लगा। चलचित्र संगीत की प्रारम्भिक समय से लेकर वर्तमान समय तक की यात्रा का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि ऐसे बेशुमार गीत है जिनकी रचना ठुमरी के आधार पर की गई और उनमें से काफी गीत जनसाधारण में बेहद लोकप्रिय भी हुए। चूंकि फिल्म संगीत में शब्दों एवं भावों की अभिव्यक्ति पर ध्यान विशेष रूप से केन्द्रित रहता है तथा कलाकारी की गुंजांइश कम रखी जाती है इसलिए शायद शास्त्रीय संगीत की शेष विधाओं की तुलना में ठुमरी विधा का चित्रपट में अधिक प्रचलन रहा है। अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ठुमरी गायन को चित्रपट संगीत में प्रमुखतः तीन प्रकार से प्रयोग किया गया है। पहला शुद्ध अर्थात परम्परागत ठुमरियां, दूसरा परम्परागत शास्त्रीय ठुमरियों की धुन, रचना शैली एवं काव्य के आधार पर चित्रपट की ठुमरियां तथा तीसरा ठुमरीनुमा गीत। जैसा कि ठुमरी के इतिहास से ज्ञात होता है कि ठुमरी का प्रारम्भिक प्रयोग कथक नृत्य के साथ किया जाता था। अतः इसका प्रचलन अधिकतर तवायफों के कोठों पर होता था, जो नृत्याभिनय के साथ भावपूर्ण ढंग से ठुमरी का प्रस्तुतिकरण करती थी। अतः चित्रपटों में भी जब-जब संगीत निर्देशकों को कहानी में ऐसी परिस्थितियां मिली तो उन्होंने ठुमरी गायन विधा का निःसंकोच प्रयोग किया। बाद में धीरे-धीरे शृंगार रस के संयोग एवं वियोग पक्ष पर आधारित गीतों के लिए भी ठुमरी एवं ठुमरीनुमा गीतों की रचना चित्रपटों में की जाने लगी। जनसाधारण ने ठुमरी के प्रत्येक रूप में किए गए प्रयोग को सराहा है। साथ ही ठुमरी गायन विधा ने संगीत रसिकों को अपने जादुई प्रभाव से मंत्र-मुग्ध किया है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देष्य उन प्रसिद्ध परम्परागत शास्त्रीय ठुमरियों की चर्चा करना है जिनका प्रयोग चित्रपट संगीत में शास्त्रीयता के साथ किया गया है।

Keywords
सुमधुर, शृंगारात्मक परम्परागत ठुमरियां
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