सितार वादन में पंडित रवि शंकर और उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान के बाज़ का तुलनात्मक अध्ययन

SL-RCTRM-2018 | Special Issue | OCT-2018 | Published Online: 20 October 2018    PDF ( 186 KB )
Author(s)
नीतिका रानी 1

1सहायक प्रोफैसर (संगीत वादन) देवकी देवी जैन मैमोरियल कॉलेज फॉर वुमैन, लुधियाना।

Abstract

इस संसार में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग होता है फिर चाहे यह एक परिवार में जन्मे तीन व्यक्ति ही क्यों न हों, सब की अपनी अलग-अलग प्रवृत्ति होती है। संगीत एक ऐसी कला है जो जात-पात और धर्म के बंधनों से मुक्त है। समय की परिस्थितियों के कारण ही एक घराने में उपजे प्रत्येक कलाकार का अपने गायन व वादन का विशेष ढंग होता है इसलिए ही प्रत्येक कलाकार की वादन शैली दूसरे कलाकार की वादनशैली से अलग रूप धारण कर लेती है। संगीत के क्षेत्र में उस्ताद विलायत खान, पं. निखिल बनर्जी, पं.देबू चौधरी, उस्ताद रईस खान, उस्ताद शाहिद परवेज खान और उस्ताद सुनात खां आदि वादकों ने अपनी वादनशैली में नवीनता लाई जिसके कारण इन कलाकारों की संगीत के क्षेत्र में एक नई पहचान बन गई। जहाँ संगीत के क्षेत्र में उपरोक्त नाम अपना विशेष स्थान रखते हैं वहीं मैहर घराने के बहुपक्षीय शख्सियत पं. रवि शंकर और इन्दौर घराने के प्रमुख कलाकार उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान के नाम से हर एक संगीत प्रेमी जानकार है। जहाँ पं. रवि शंकर का सितार वादन अपनी नवीनता के कारण संगीत के क्षेत्र में अलग पहचान रखता है वही उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां ने अपने एक नए बाज़ की रचना करके अपने सितार वादन की नई पहचान बनाई। यह दोनों कलाकार समकालीन थे फिर भी इनका सितार वादन की अपनी-अपनी विशेषता के कारण लोकप्रिय बना। इनके सितार वादन की विशेषता, समानता और असमानता को देखते हुए पं. रवि शंकर और अब्दुल हलीम जाफर खान के बाज़ का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। ताकि हमारी युवा पीढ़ी को इस सितार वादकों की वादन शैली से परिचित करवाया जा सके।इन दोनों कलाकारों की वादन शैली की अलग-अलग विशेषता थी। जहाँ पं. रवि शंकर के बाज़ में ध्रुपद और धमार के अंग का ज्यादा प्रभाव देखने को मिलता है। वहीं उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां के बाज़ में सुगमता की झलक दिखाई देती है। पं. रवि शंकर के बाज़ में नवीनता कम और प्राचीनता ज्यादा दिखाई देती है परन्तु खान साहिब के बाज़ में प्राचीनता कम और नवीनता अधिक दिखाई देती है। ऐसी महान कलाकारों की वादन शैलियों से विद्यार्थियों को जानकारी प्रदान करवाने के लिए कार्यशलाएँ करवानी चाहिए, इन कार्यशलाओं में हर बार यह कोशिश करनी चाहिए कि अलग-अलग घरानें के सुप्रसिद्ध कलाकारों को बुलाया जाए, ताकि इन कलाकारों के आने से विद्यार्थी उन कलाकारों की निजी संगीतक शिक्षा और उनके घराने की प्रसिद्ध बंदिशों से परिचित हो सके। इस प्रकार अप्रचिलत बंदिशों और महान कलाकारों की वादन शैली जो आज के समय में कहीं न कहीं छुपती जा रही है। वो फिर से आगे आ सके और नवीन पीढ़ी के विद्यार्थी इन महान कलाकारों की वादन शैली के बारे में जान सके।

Keywords
सितार वादन संगीत वादन शैली
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