तेरहवीं लोकसभा आम चुनाव(1999)-एक विश्लेषण

Vol-1 | Issue-10 | October 2016 | Published Online: 10 October 2016    PDF ( 137 KB )
Author(s)
रिन्कु कुमारी 1

1पीएचडी राजनीति विज्ञान, पटना विश्वविद्यालय, पटना

Abstract

अगर भारत की चुनावी राजनीति पर सरसरी निगाह डाली जाय तो यह तथ्य सामने आता है कि एकल पार्टी प्रभुत्व का अवसान सही मायने में 1999 के आम चुनावों में हुआ था। इसकी वजह यह थी कि 1977-80 के जनता सरकार कोई स्थायी प्रभाव छोड़ने में सर्वथा नाकाम रही थी। 1989-91 के बीच वाली सरकार और 1996-98 की गठबंधन सरकार-दोनों को कांग्रेस का परोक्ष समर्थन हासिल था। लेकिन 1999 के चुनावों ने पहली बार राजनीतिक रूप से अछूत समझी जानी वाली भाजपा की ऐसी सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त किया, जो भारतीय राजनीति में अपना कार्यकाल ठसक के साथ पूरा करनेवाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इसने कई भ्रमजाल को तोड़ा और भावी राजनीति की दशा और दिशा तय करनेवाले असर छोड़े। अभी तक एकच्छत्र या एकला चलो या गठबंधन राजनीति से अलग राह पर चलनेवाली कांग्रेस को इन चुनावों ने यथार्थवाद से सामना करवाया कि उसके लिए आगे की राह तभी संभव है जब वह छोटी पार्टियों को अपने साथ लेकर उदीयमान भाजपा का सामना कर सकती है। कांग्रेस के पास इस वास्तविकता को स्वीकार करने का फायदा 13वीं लोकसभा चुनावों में तो नहीं पर 14वीं लोक सभा चुनावों में अवश्य मिला। जबकि भाजपा को इन चुनावों ने इस सच से सामना करवाया कि गठबंधन सरकारों और बेमेल पार्टियों को एक साथ लेकर सरकार बनाना कितनी टेढ़ी खीर है। अपने दम पर सरकार बनाने के लिए उसे पूरे 10 वर्षों का वनवास झेलना पड़ा, जो 16वीं लोक सभा चुनावों में जाकर खत्म हुआ। 1999 के चुनावों में कारगिल संघर्ष का प्रत्यक्ष प्रभाव था और राष्ट्रवादी भावनाओं का चुनावों पर पड़नेवाले प्रभाव खुल कर दृष्टिगत हुए। भाजपा को जहां इसका लाभ हुआ, वहीं इस नए आयाम ने कांग्रेस के सामने अलग तरह की समस्या खड़ी कर दी। भाजपा जहां खुलकर इस कार्ड का इस्तेमाल कर रही थी, जिसका उसे लगातार फायदा होता रहा, जबकि कांग्रेस रक्षात्मक रणनीति बनाने को बाध्य हुई। प्रस्तुत शोध-आलेख में इन्हीं सब बिन्दुओं की विवेचना की गई है।

Keywords
13वीं लोक सभा आम चुनाव, राजग सरकार, कारगिल संघर्ष, एकल पार्टी प्रभुत्व, गठबंधन सरकार।
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